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varnpiramid by Rakmish Sultanpuri
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पिरामिड।सच के प्रति।
1-
क्या
तुम
ऐनक ?
उतार दो
नग्नता देखो
शोषण का धंधा
शर्माता जाता अँधा
2-
है
कोई
बिकाऊ ?
खुलेआम
छिपते क्यों हो
फेंक दो चादर
ये झूठा है सम्मान
पिरामिड।देव वन्दना।
1-
हे
देव
दयालु
दयाकर
सद्भावना
भर दे क्लेश में
स्नेह फैले देश में
2-
दे
ईश
प्रेरणा
प्रगाढ़ता
भक्ति प्रवाह
सम्बन्धो में आह
विवेक को सन्मार्ग
3-
दो
ज्ञान
अज्ञान
मिटाकर
समभावना
समृद्धि सत्कर्म
पल्लवित हो धर्म
4-
तू
प्राण
प्रेरित
प्रखरता
उदीप्त दीप
भर हृदय में
निलय का शीप
5-
हूँ
भृत्य
सेवक
अनुचर
हो दया वृष्टि
स्नेह भर मात्र
निर्मम कृपापात्र
वर्ण पिरामिड । कवि के प्रति।
1
हे
कवि
कर्तव्य
कल्पना से
कभी कभार
कठिन प्रमाण
करो बिम्ब निर्माण
2
हो
तुम
दर्पण
समाज का
करो प्रयास
सत्य का प्रकाश
हृदय का एहसास
" ममता"
1
हे
तन
ममता
परित्याग
जीवन भर
जीवन के बाद
सब जाता बिखर ।
2
तो
मत
भरना
हृदय में
दुख़द भाव
किसी के मन में
भरो नेह प्रभाव
वर्ण पिरामिड ।बर्फ के प्रति ।
1
ले
आती
ठंडक
फुलझड़ी
खेलें पर्वत
ठोस द्रव गैस
खरीदे हिमालय
2
ले
ओढ़
चादर
हिमालय
बर्फ के धागें
चाँदी की परत
ठण्डी में तानकर
वर्ण पिरामिड ।मानवता के प्रति ।
1
रे
शठ
मनुज !
मानवता
रिस्तों की लाज
टूटती उल्काएं
बिखरता समाज
2
लो
देखो
धूमिल
प्रदूषित
परम्पराएँ
कलुषता लोभी
दौड़ी मुँह फैलाये
3
खो
देता
हृदय
कृत्रिमता
पनपे ठूठे
हरियाली ढही
रचते स्वांग झूठे
4
हो
मत
आहत
उठ जागो
जले मसाल
नव जागरण
फैले ज्योति विशाल
5
दो
त्याग
मुखौटे
प्रलोभन
सच्चा दर्पण
झलके संसार
है प्रेम, समर्पण
पिरामिड।माँ।
1
तो
देखे
जलती
सूखे मुँह
धूमिलताएँ
प्रत्येक महीना
गरीब का पसीना
2
माँ
है वो
धरती
बिलखती
फूलों सी हँसी
आह री बेबसी
पलक झपकती
3
से
लेती
दुर्दिन
माताएँ भी
धूप की छाया
ममता ऊपर
खेतोँ के ढेलों पर
4
न
होती
आशाएं
आँशू कैसा
दुःखों के पार
रखती धीरज
निकलेगा सूरज
पिरामिड। तुलसी के प्रति ।
1
भो !
पात्र
तुलसी
पवित्रता
एक प्रतीक
कलुषता धोती
औषधि भी है नीक
2
ये
कोने
आँगन
महकते
हृदयांकुर
पत्तियां की हँसी
भक्ति का है प्रकाश
वर्ण पिरामिड। भैया दूज ।
1
यें
धागें
स्नेह के
अनकहे
गुंजायमान
बन्धन अटूट
बहनों की है शान
2
वो
टीका
माथे का
भैया दूज
फैला प्रकाश
एक दृढ़ स्तम्भ
प्रेम और विश्वास
वर्ण पिरामिड । माँ ।
1
माँ
रोटी
खिलाती
दूधवाला
कातर आँखे
सड़क के पार
जाता लिये निवाला
2
दो
बूँद
कठिन
दुधमुँहा
तड़फ़ड़ाता
क्रंदन के स्वर
तन सिंहर जाता
3
वे
आँखे
दुर्दिन
पछताती
असहायता
थपकियां देती
आँखे नेह छिपातीं
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Writen by Rakmish Sultanpuri
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